
कहो तो जिंदगी तुम पर लुटा दूँ
तुम्हारे प्यार को क्यूँकर भुला दूँ
ज़रूरी है के मैं आंसू बहाऊँ
तुम्हें तनहाइयों में गर सदा दूं
अब इतना भी मुझे मायूस न कर
कहीं ख़ुद को तरस खा कर मिटा दूँ
घिरा हूँ मैं शिकस्ता कोशिशों में
उमर मैं किस तरह हंस कर बिता दूँ
बढे जाते हैं अब ग़म के अंधेरे
कहो तो इस दफा मैं घर जला दूँ
बड़े ही सख्त ये लम्हे गए हैं
क़यामत हो मैं इनको गर सुना दूँ
परस्तिश के लिए तुमको चुना है
कहो मुजरिम अगर मैं सर उठा दूँ
न हो जिन रास्तों पे साथ तेरा
क़दम उस राह पर क्यूँ कर बढ़ा दूँ
मैं मर जाऊं अगर जीना हो तुमबिन
यूँ ख़ुद को हाथ फैला कर दुआ दूँ
नही होते हो जब तुम पास मेरे
ये जी करता है हर मंज़र मिटा दूँ
अगर तुम साथ दो राह-ऐ-वफ़ा में
मैं पलकों से हर एक पत्थर हटा दूँ
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