Friday, July 11, 2008

कब tak


  • चंद बोसीदा से लम्हों को निभाते कब तक
  • मेरे हालात पे यूँ अश्क बहते कब ताक
  • कब तक मेरी बर्बाद मोहब्बत को पनाहें देते
  • दिल के उजडे हुए गुलशन को सजाते कब तक
  • तुम ने achha ही किया पास ऐ वफ़ा तोड़ दिया
  • मेरे जज्बों के जनाजों को उठाते कब तक
  • वैसे भी मेरे दिल का कोई मोल तो न था
  • तुम बचाते भी तो इसको बचाते कब तक
  • मेरे वीरान अंधेरों से तुम्हें क्या मिलता
  • अपनी आंखों में मेरा प्यार सजाते कब तक
  • door तक राह में पत्थर ही नज़र आते थे
  • तुम निभाते भी तो साथ निभाते कब तक
  • अब एय्हेद केर चुके हैं देंगे नहीं सदाएं
  • हम दुआओं के लिए हाथ उठाते कब tak

1 comment:

  1. Anonymous11:15 PM

    itna pareshan hone ka nahi zakir bhai
    jo sath nibhate hai wo waqt ka intzar nahi karte

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