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Sunday, May 10, 2009

गर हैं नही कुबूल तो लौटा दो मेरे सजदे


गर हैं नही कुबूल तो लौटा दो मेरे सजदे


हम ने माँगा to हमें कोई सहारा न मिला
पार ले जाता कोई ऐसा इशारा न मिला
दोस्त मिलते गए दाग-ऐ-जिगर देते गए
अजनबी तुम भी रहे कोई हमारा न मिला

तुमको आवाज़ बताओ मैं कहाँ तक देता
अपनी रुदाद-ऐ-जुनू और कहाँ तक कहता
और जो चाहता तुम्हें शायद तो मैं मर जाता
दर्द जो तुमने दिए थे मैं कहाँ तक सहता

मैंने रातों के अंधेरों में पुकारा तुमको
मैंने सुबह के उजालों में पुकारा तुमको
मेरी आवाज़ की शिद्दत में वो गर्मी ही न थी
मैंने सेहरा मैं सरबो में पुकारा तुमको

मेरी उम्मीद-ऐ-वफ़ा, शान-ऐ-इबादत तुम थे
मेरी दुनिया में फ़क़त एक मोहब्बत तुम थे
तुम ही आगाज़ थे मेरा, तुम ही अंजाम-ऐ-हयात
मेरी फरयाद-ऐ-वफ़ा, मेरी शिकायत तुम थे

मैंने सीने से तेरे ग़म को लगाये रखा
तुझको दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा
मुश्किलें कौन सी ऐसी थी जो न मुझ पे रहीं
मैंने साँसों में तुझे अपनी बसाये रखा

तल्खी-ऐ-नाकामी-ऐ-हयात की शिकायत कभी न की
सख्तियाँ बढती गई और बढे मेरे सजदे


काँप उठे हैं अब तो मेरे दस्त-ऐ-तलब

गर हैं नही कुबूल तो लौटा दो मेरे सजदे

Wednesday, April 01, 2009

उदास रात में


उदास रात में,
चुपके से....
तसव्वुर ने तेरे दस्तक दी है
मैं जो वीरान अपनी आंखों में

बुझते सपने सजाये बैठा था
बेकसी की सितम जदा चीखें
अपने दिल में दबाये बैठा था
मुस्कुराहटों का मातम था
और मैं मुस्कुराये बैठा था
मैं ने दुनिया को दोस्त जाना था
मैं इसे आजमाए बैठा था
वक्त ने नोंच ली हँसी लअब्ब से
मैं के नज़रें झुकाए बैठा था
आह चल पाया न साथ दुनिया के
ख़ुद को भी आजमाए बैठा था
मतलबी दुनिया के झूटे रिश्तों से
अपना दामन जलाये बैठा था
मौत आ जाती के सुकून मिलता
कब से नज़रें बिछाये बैठा था
जिस उदासी से दूर रहता था
उसको ख़ुद में समाये बैठा था
जैसे सारे गुनाह मेरे थे
ऐसे कुछ सर झुकाए बैठा था
आसमानों से आग बख्शी गई
हाथ मैं फैलाये बैठा था
हाँ के भूल जाना लाजिम था
हाँ मैं तुमको भुलाये बैठा था

अब उदासी के ऐसे आलम में
जो तेरी याद चुपके से चली आई है
सामने मेरे खड़ी है ये अजनबी की तरह
ऐसा लगता ही नही इस से शनासाई है

सोचता हूँ के इसे दिल में बुला लेता हूँ
दो घड़ी के लिए फिर ख़ुद को सज़ा देता हूँ
मुस्कुरा लेता हूँ फिर अश्क बहने के लिए
नवाजिशेय हयात का कुछ और मज़ा लेता हूँ

पर पशेमान हूँ के मेरे दिल में बची
तेरी यादों तेरी बातों की जगह कोई नहीं
अब मेरे पास उदासी के घने साए हैं
हुस्न के शौख उजालों की जगह कोई नहीं
धुन्धलाये से नगमे हैं बोसीदा से वादे
दिल के मासूम फसानों की जगह कोई नहीं


मेरे पहलु से तुम इस याद को वापस ले लो
जिंदा रहने के बहानों की जगह कोई नहीं

Thursday, March 26, 2009

साथ कुछ दूर तो दिया होता....


साथ कुछ दूर तो दिया होता
मुझ पे एहसान ही किया होता

प्यार तुमसे न गर किया होता
शायद कुछ और दिन जिया होता

दिल की कीमत अगर पता रहती
दिल न तुमको कभी दिया होता

ग़म इनायत ही कोई कम तो न थी
ग़म को रुसवा तो न किया होता


हयाते मुख्तसर और तवील तनहा राहें
ग़म को ही साथ कर दिया होता

बे ताल्लुक जिया नही जाता
कोई इल्जाम ही दिया होता

साथ तेरा तो खैर क्या मिलता
झूठा वादा ही कर दिया होता

तुम तो अब गैर बनके मिलते हो
कुछ तो पासे वफ़ा किया होता

वक्ते रुखसत ये मुरव्वत कैसी
मरना आसान कर दिया होता

सबके हिस्से में चाँद सूरज थे
टूटा तारा मुझे दिया होता

Sunday, February 22, 2009

थमे थमे से इस वक्त से.....








थमे थमे से इस वक्त से ....



इस वक्त जबके तुम भी नही

कोई आरजू नही, कोई जुस्तुजू नही



न तो कुर्बतें हैं न केहकहे

कोई दोस्त,दुश्मन, अदू नही

खड़ा उस जगह पे हूँ जहाँ

जो मैं चाहूँ तो ख़ुद को मिलूं नही



न तो दिल ये मेरा उदास है

न किसी के आने की आस है

न तो मयकशी में है दिलकशी

न लबों पे मेरे ही प्यास है



न तो याद मुझको रहा कोई

न किसी को याद मैं आ सका

न तड़प रही न कसक रही

न मैं अश्क कोई बहा सका



ये बड़ा अजीब सा दौर है

मैं, मैं नही कोई और है

यहाँ बेजुबान हैं आहो करब

खामोशियों का शोर है



यहाँ वक्त अब ये ठहर गया

जो गुज़र गया वो गुज़र गया

ज़रा देख मुझको टटोल कर

मैं हयात हूँ के मर गया



कोई एहसान है जो किए जाता हूँ

बस के जिंदा हूँ जीये जाता हूँ



थमे थमे से इस वक्त से...

बस इतना पूछना चाहता हूँ मैं



गुज़र गई है जब ये जिंदगी यूँ ही



तो ये वक्त क्यूँ थमा है....



गुज़र क्यूँ नही जाता.........

Monday, February 09, 2009

उदासियों के हज़ार खंज्जर मेरे सीने में......





उदासियों के हज़ार खंज्जर मेरे सीने में गढ़ चुके हैं
k
खुशियों के देहेक्तेय पत्ते इस शजर से झढ़ चुके हैं


dum todtey हुए ख्वाबों की कसक है
बिखरे पडे हुए अरमान की खनक है


कज्लाई हुयी शामें हैं अंधियारे सवेरे
छाए हैं उदासी के बे हिस से अंधेरे


पलकों पे सजाये हूँ मैं अश्खों के नगीने
डूबे हैं साहिलों पे सभी मेरे सफीने


हिस्से में मेरे आई हैं नाकाम वफाएं
नाजां हैं फिर भी कर के सभी मुझसे जफ़ाएं


भीगी हुयी खुशी अत मुझको की गई
नाकर्दा गुनाहों की सज़ा मुझको दी गई


बख्शी गई मुझ ही को सभी लग्ज़िशें यहाँ
पूछो न किस तरह से लुटी क्वाहिस्हें यहाँ


मुझको मेरे खुलूस बर्बाद कर गए
दिल की वीरानियों को आबाद कर गए


इन का साया भी पडे तुम पर गवारा नही मुझे
इस लिए मैं ने हमदम पुकारा नही तुझे




Wednesday, October 11, 2006

Thamay Thamay Se Iss Waqt Se....

Iss Waqt JabKe Tum Bhi Nahin
Koi Aarzoo Nahin Koi Justajoo Nahin

Naa Tou Qurbatein Hain Naa QehQahey
Koi Dost, Dushman, Âduv Nahin
Khada Uss Jageh Pe Hoon Jahan
Jo Main Chahoon Tou Khudd Ko Miloon Nahin

Naa Tou Dil Yeh Mera Udaas Hai
Naa Kisi Ke Aane Ki Aas Hai

Naa Tou Maykashi Main Hai Dilkashi
Naa Labon Pe Mere Hi Pyaas Hai

Naa Tou Yaad Mujhko Raha Koi
Naa Kisi Ko Yaad Main Aa Saka

Naa Tadap Rahi Naa Kasak Rahi
Naa Main Ashk Koi Baha Saka

Yeh Bada Ajeeb Sa Daur Hai
Main, Main Nahin Koi Aur Hai

Yahan Bezubaan Hain Aah-o-Karb
Khamoshiyon Ka Shor Hai

Yahan Waqt Ab Yeh Thehar Gaya
Jo Guzar Gaya Woh Guzar Gaya

Zara Dekh Mujhko Tatol Ker
Main Hayat Hoon Ke Mer Gaya

Koi Ahsaan Hai Jo Kiye Jaata Hoon
Bas Ke Zinda Hoon Jiye Jaata Hoon

Thamay Thamay Se Iss Waqt Se....
Bas Itna Poochna Chahta Hoon Main

Guzar Gayi Hai Jab Zindigi Yun Hi...

Tou Yeh Waqt Kyun Thama Hai...

Guzar Kyun Nahin Jaata.......